नई दिल्ली: दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने वर्ष 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी है। दोनों आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत मामला दर्ज है और वे पिछले लगभग छह वर्षों से न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं। अदालत के इस फैसले को दिल्ली दंगों के मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम माना जा रहा है।

क्या है पूरा मामला?

फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में हिंसा भड़क उठी थी। यह हिंसा नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच हुई थी। कई दिनों तक चले दंगों में 50 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि सैकड़ों लोग घायल हुए थे। इसके अलावा बड़ी संख्या में घर, दुकानें और वाहन आगजनी तथा हिंसा की चपेट में आए थे।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने दावा किया था कि दंगे कोई अचानक हुई घटना नहीं थे, बल्कि इसके पीछे एक सुनियोजित साजिश थी। पुलिस ने अपनी जांच में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्र नेताओं और प्रदर्शनकारियों को आरोपी बनाया। इन्हीं आरोपियों में पूर्व छात्र नेता उमर खालिद और जेएनयू के पूर्व छात्र शरजील इमाम भी शामिल हैं।

UAPA के तहत हुई गिरफ्तारी

दिल्ली पुलिस ने दोनों आरोपियों को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत गिरफ्तार किया था। पुलिस का आरोप है कि दोनों ने भड़काऊ भाषणों और कथित साजिश के जरिए दंगों को बढ़ावा देने में भूमिका निभाई। वहीं, बचाव पक्ष लगातार इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहता रहा है कि दोनों को उनके विचारों और विरोध प्रदर्शनों में भागीदारी के कारण निशाना बनाया गया।

UAPA एक सख्त कानून माना जाता है, जिसके तहत जमानत हासिल करना काफी मुश्किल होता है। कानून के अनुसार यदि अदालत को प्रथम दृष्टया आरोप सही प्रतीत होते हैं, तो आरोपी को जमानत देने से इनकार किया जा सकता है।

कोर्ट ने क्यों खारिज की जमानत?

कड़कड़डूमा कोर्ट ने दोनों आरोपियों की जमानत याचिका पर सुनवाई के बाद उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि मामले के रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए इस स्तर पर जमानत देना उचित नहीं है।

हालांकि, अदालत के विस्तृत आदेश का इंतजार किया जा रहा है, लेकिन माना जा रहा है कि अदालत ने जांच एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों और आरोपों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला सुनाया है।

बचाव पक्ष ने उठाए थे ये तर्क

उमर खालिद और शरजील इमाम की ओर से दायर जमानत याचिकाओं में कहा गया था कि वे लंबे समय से जेल में बंद हैं और मुकदमे की सुनवाई अभी पूरी नहीं हुई है। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि संविधान प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष सुनवाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है।

इसके अलावा, आरोपियों के वकीलों ने यह भी कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है और उन्हें लंबे समय तक जेल में रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

दिल्ली दंगों का मामला अब भी चर्चा में

फरवरी 2020 के दिल्ली दंगे देश के सबसे चर्चित मामलों में से एक रहे हैं। इस मामले में कई आरोपियों के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं और अलग-अलग अदालतों में कई याचिकाओं पर सुनवाई जारी है। दंगों के दौरान हुई हिंसा, जान-माल का नुकसान और उसके बाद की जांच लगातार राजनीतिक और कानूनी बहस का विषय बनी हुई है।

उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज होने के बाद अब उनकी कानूनी टीम उच्च अदालत का रुख कर सकती है। आने वाले दिनों में इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

आगे क्या?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों आरोपी अब दिल्ली हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जमानत के लिए अपील कर सकते हैं। वहीं, दिल्ली दंगों की कथित साजिश मामले की सुनवाई अभी जारी है और अंतिम फैसला आने में अभी समय लग सकता है।

फिलहाल, कड़कड़डूमा कोर्ट के इस फैसले ने उमर खालिद और शरजील इमाम को बड़ा झटका दिया है और दिल्ली दंगों से जुड़े इस बहुचर्चित मामले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।

 

 

 

 

रिपोर्टर * श्रीमती शोभा भाटी

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