दिल्ली का SWAMINARAYAN AKSHARDHAM केवल एक भव्य धार्मिक और सांस्कृतिक परिसर ही नहीं है, बल्कि यह शहरी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन पर चल रही बहस का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यह मंदिर यमुना नदी के किनारे स्थित उस क्षेत्र में बना है जिसे दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के मास्टर प्लान में ‘ओ’ ज़ोन (Zone O) या यमुना रिवर ज़ोन के रूप में चिन्हित किया गया है। यह क्षेत्र यमुना के फ्लडप्लेन यानी बाढ़ प्रभावित मैदानों का हिस्सा है, जिसे पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। क्या है ‘ओ’ ज़ोन? दिल्ली के मास्टर प्लान के अनुसार, यमुना नदी और उसके आसपास के विस्तृत फ्लडप्लेन क्षेत्र को ‘ओ’ ज़ोन के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य नदी के प्राकृतिक प्रवाह, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता और बाढ़ नियंत्रण को सुरक्षित रखना है। यह क्षेत्र वज़ीराबाद से ओखला तक फैला हुआ है और लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण तथा शहरी विकास के बीच संघर्ष का केंद्र रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि फ्लडप्लेन किसी भी नदी की प्राकृतिक सुरक्षा कवच होते हैं। जब नदी में जलस्तर बढ़ता है, तो यही क्षेत्र अतिरिक्त पानी को समाहित कर शहर को बाढ़ से बचाने में मदद करते हैं। यदि इन क्षेत्रों में अत्यधिक निर्माण हो जाए, तो बाढ़ का खतरा और पर्यावरणीय नुकसान बढ़ सकता है। अक्षरधाम मंदिर और विवाद अक्षरधाम मंदिर का निर्माण 2000 के दशक की शुरुआत में हुआ और 2005 में इसे जनता के लिए खोला गया। मंदिर परिसर लगभग 100 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला है और इसे आधुनिक भारत के सबसे बड़े मंदिर परिसरों में गिना जाता है। हालांकि, इसके निर्माण के समय पर्यावरणविदों और कुछ सामाजिक संगठनों ने चिंता जताई थी कि यमुना फ्लडप्लेन में इतने बड़े निर्माण से नदी की पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है। उनका तर्क था कि फ्लडप्लेन में बड़े पैमाने पर कंक्रीट संरचनाएं भूजल पुनर्भरण और प्राकृतिक जल प्रवाह को बाधित कर सकती हैं। दूसरी ओर, मंदिर प्रबंधन और समर्थकों का कहना था कि परियोजना को आवश्यक स्वीकृतियों के बाद विकसित किया गया तथा निर्माण के दौरान पर्यावरणीय मानकों का पालन किया गया। उनका यह भी तर्क था कि परिसर के भीतर हरित क्षेत्र, जल संरक्षण और स्वच्छता के उपाय अपनाए गए हैं। विकास बनाम पर्यावरण अक्षरधाम मंदिर का मामला केवल एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं है। इसी ‘ओ’ ज़ोन में कई अन्य परियोजनाएं भी विकसित हुई हैं, जिनमें आवासीय कॉलोनियां, सड़क परियोजनाएं और अन्य सार्वजनिक ढांचे शामिल हैं। हाल के वर्षों में यमुना फ्लडप्लेन में अवैध निर्माणों को लेकर दिल्ली में बड़ा विवाद खड़ा हुआ है। कई कॉलोनियां और लाखों घर ‘ओ’ ज़ोन के अंतर्गत आने के कारण कानूनी और पर्यावरणीय जांच के दायरे में हैं। यह स्थिति एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करती है—क्या तेजी से बढ़ते महानगर में विकास परियोजनाओं को रोका जा सकता है, या फिर पर्यावरणीय सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए? यमुना फ्लडप्लेन का पर्यावरणीय महत्व यमुना का फ्लडप्लेन दिल्ली के लिए प्राकृतिक जल भंडार की तरह कार्य करता है। यह क्षेत्र: भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद करता है। बाढ़ के समय अतिरिक्त पानी को समाहित करता है। पक्षियों, वनस्पतियों और अन्य जीवों के लिए प्राकृतिक आवास प्रदान करता है। शहर के तापमान और प्रदूषण को नियंत्रित करने में योगदान देता है। 2023 और उसके बाद के वर्षों में आई बाढ़ों ने यह दिखाया कि फ्लडप्लेन क्षेत्रों का संरक्षण कितना आवश्यक है। कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यदि प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्रों पर अतिक्रमण जारी रहा तो भविष्य में दिल्ली को और गंभीर बाढ़ संकट का सामना करना पड़ सकता है। संतुलन की दिशा में प्रयास दिल्ली विकास प्राधिकरण ने हाल के वर्षों में यमुना रिवरफ्रंट पुनर्जीवन, जैव विविधता पार्क, वेटलैंड संरक्षण और हरित क्षेत्रों के विकास जैसी परियोजनाएं शुरू की हैं। इनका उद्देश्य यमुना के पर्यावरणीय स्वास्थ्य को सुधारना और नागरिकों को प्रकृति से जोड़ना है। साथ ही न्यायालयों और पर्यावरणीय संस्थाओं ने भी फ्लडप्लेन में व्यावसायिक गतिविधियों और अतिक्रमणों पर नियंत्रण के लिए समय-समय पर हस्तक्षेप किया है। निष्कर्ष अक्षरधाम मंदिर और दिल्ली का ‘ओ’ ज़ोन केवल एक निर्माण परियोजना या पर्यावरणीय विवाद की कहानी नहीं है, बल्कि यह आधुनिक भारत के विकास मॉडल की एक महत्वपूर्ण परीक्षा भी है। एक ओर धार्मिक, सांस्कृतिक और बुनियादी ढांचे के विकास की आवश्यकता है, तो दूसरी ओर यमुना जैसी जीवनदायिनी नदी और उसके फ्लडप्लेन की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। भविष्य की शहरी योजना का लक्ष्य ऐसा संतुलन स्थापित करना होना चाहिए, जिसमें विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक बन सकें। अक्षरधाम और ‘ओ’ ज़ोन का अनुभव यही सिखाता है कि सतत विकास तभी संभव है जब प्रकृति की सीमाओं का सम्मान करते हुए योजनाएं बनाई जाएं। Editor Shobha Bhati Post navigation बॉर्डर पर सख्ती का असर: खुद पहचान बताने लगे संदिग्ध बांग्लादेशी प्रवासी “नारी सम्मान पर सवाल: क्यों नहीं थम रहे रेप और दहेज के मामले?”