कभी गांवों और कस्बों की गलियों में बच्चों की किलकारियां, दौड़-भाग और खेलों का शोर गूंजता था। आज उसी जगह मोबाइल फोन और कंप्यूटर स्क्रीन ने ले ली है। 80 वर्षीय महावीर प्रसाद जैन नंबरदार जब अपने बचपन की यादों को ताजा करते हैं तो उनकी आंखों में पुराने दिनों की चमक दिखाई देती है, वहीं आज की पीढ़ी को लेकर चिंता भी साफ झलकती है।

हरियाणा नंबरदार एसोसिएशन के पूर्व जिला अध्यक्ष महावीर प्रसाद जैन नंबरदार का मानना है कि बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में आ रही गिरावट का सबसे बड़ा कारण मैदानी खेलों से बढ़ती दूरी है।

उन्होंने बताया कि उनके समय में स्कूल से लौटते ही बच्चे दोस्तों के साथ मैदानों की ओर दौड़ पड़ते थे। घंटों तक खेल चलता था और न भूख-प्यास का ध्यान रहता था, न समय का। उस दौर के खेल केवल मनोरंजन का साधन नहीं थे, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का आधार भी थे।

महावीर नंबरदार ने बताया कि किल-किल कटिया, पेट गुट्टी, अष्टा चांगा, चौपड़, हवाई जहाज, स्नोकी, लुकाछिपी, चोर-सिपाही, पिट्ठू गरम, विष-अमृत, ऊंच-नीच का पापड़ा, खो-खो और घोड़े वाला जैसे खेल हर बच्चे की दिनचर्या का हिस्सा हुआ करते थे।

उन्होंने कहा कि उस समय गुड्डा-गुड़िया का ब्याह भी एक लोकप्रिय खेल था। बच्चे मिलकर कपड़ों से दूल्हा-दुल्हन तैयार करते, निमंत्रण बांटते और पूरे रीति-रिवाज के साथ विवाह का आयोजन करते थे। इससे बच्चों में सामाजिक समझ और आपसी सहयोग की भावना विकसित होती थी।

महावीर नंबरदार का कहना है कि इन्हीं पारंपरिक खेलों का परिणाम है कि 80 वर्ष की आयु में भी वे स्वयं को ऊर्जावान और सक्रिय महसूस करते हैं। उनका मानना है कि आज के बच्चों की तुलना में उनकी शारीरिक क्षमता अधिक मजबूत है क्योंकि उनका बचपन मैदानों में बीता है, मोबाइल स्क्रीन पर नहीं।

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि आज बच्चों पर पढ़ाई का दबाव बढ़ गया है और खाली समय मिलने पर भी वे मोबाइल, कंप्यूटर और वीडियो गेम में व्यस्त हो जाते हैं। इससे उनका शारीरिक विकास प्रभावित हो रहा है और मानसिक समस्याएं भी बढ़ रही हैं।

मोयल मेमोरियल हॉस्पिटल, नगीना के वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुरेन्द्र कुमार भी इस बात से सहमत हैं। उनका कहना है कि पारंपरिक मैदानी खेल पूरे शरीर का प्राकृतिक व्यायाम कराते हैं। इससे बच्चों में सहनशक्ति, मानसिक चपलता, टीम भावना और आत्मविश्वास विकसित होता है।

महावीर नंबरदार का कहना है कि इन्हीं पारंपरिक खेलों का परिणाम है कि 80 वर्ष की आयु में भी वे स्वयं को ऊर्जावान और सक्रिय महसूस करते हैं। उनका मानना है कि आज के बच्चों की तुलना में उनकी शारीरिक क्षमता अधिक मजबूत है क्योंकि उनका बचपन मैदानों में बीता है, मोबाइल स्क्रीन पर नहीं।

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि आज बच्चों पर पढ़ाई का दबाव बढ़ गया है और खाली समय मिलने पर भी वे मोबाइल, कंप्यूटर और वीडियो गेम में व्यस्त हो जाते हैं। इससे उनका शारीरिक विकास प्रभावित हो रहा है और मानसिक समस्याएं भी बढ़ रही हैं।

मोयल मेमोरियल हॉस्पिटल, नगीना के वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुरेन्द्र कुमार भी इस बात से सहमत हैं। उनका कहना है कि पारंपरिक मैदानी खेल पूरे शरीर का प्राकृतिक व्यायाम कराते हैं। इससे बच्चों में सहनशक्ति, मानसिक चपलता, टीम भावना और आत्मविश्वास विकसित होता है।

 

 

 

 

रिपोर्टर * श्रीमती शोभा भाटी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *