ईरान और अमेरिका के बीच हालिया समझौते तथा क्षेत्रीय तनाव में आई कमी ने मध्य पूर्व की राजनीति को नई दिशा दे दी है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में यदि किसी नेता को सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान हुआ है, तो वह हैं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू। वर्षों से ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने वाले नेतन्याहू ने अपने राजनीतिक भविष्य का बड़ा हिस्सा इसी मुद्दे पर दांव पर लगाया था। उनका दावा था कि ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताएं केवल इजरायल ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए खतरा हैं। हालांकि हालिया घटनाओं ने उनकी रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। नेतन्याहू लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान के खिलाफ अभियान चलाते रहे हैं। उन्होंने बार-बार अमेरिका और पश्चिमी देशों से मांग की कि तेहरान पर अधिकतम दबाव बनाया जाए। उनका मानना था कि कड़े प्रतिबंध और सैन्य दबाव ही ईरान को झुकाने का एकमात्र रास्ता हैं। लेकिन अब जब अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत तथा समझौते की राह खुली है, तो नेतन्याहू की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं दिखाई दे रही। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस संघर्ष को लेकर नेतन्याहू ने अपने राजनीतिक करियर को दांव पर लगाया था, उसका परिणाम उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं निकला। ईरान में सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ, वहां की राजनीतिक व्यवस्था पहले की तरह कायम है। इसके अलावा ईरान के मिसाइल कार्यक्रम पर भी कोई ऐसी निर्णायक रोक नहीं लगी है, जिसे इजरायल अपनी बड़ी जीत बता सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में सुधार होता है, तो क्षेत्रीय राजनीति में इजरायल की भूमिका अपेक्षाकृत कमजोर पड़ सकती है। नेतन्याहू ने वर्षों तक यह तर्क दिया कि ईरान को रोकना मध्य पूर्व की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। लेकिन अब कई देश आर्थिक सहयोग और कूटनीतिक समाधान को अधिक महत्व दे रहे हैं। घरेलू राजनीति में भी नेतन्याहू को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। विपक्ष पहले से ही उन पर आरोप लगाता रहा है कि उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया। अब जब ईरान के खिलाफ उनकी आक्रामक नीति से अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, तो आलोचकों को सरकार पर हमला करने का नया मौका मिल गया है। हालांकि नेतन्याहू और उनकी सरकार अभी भी यह दावा कर रहे हैं कि ईरान पर दबाव बनाए रखने की जरूरत है। उनका कहना है कि तेहरान की गतिविधियों पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन अंतरराष्ट्रीय माहौल बदलता नजर आ रहा है और अमेरिका भी सैन्य टकराव के बजाय कूटनीतिक रास्ते को प्राथमिकता देता दिखाई दे रहा है। कुल मिलाकर, ईरान-अमेरिका समझौते और क्षेत्रीय तनाव में कमी ने बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक रणनीति को बड़ा झटका दिया है। जिस मुद्दे को उन्होंने अपनी पहचान और नेतृत्व का केंद्र बनाया था, उसी पर उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि नेतन्याहू इस नई परिस्थिति में अपनी राजनीतिक पकड़ को कैसे बनाए रखते हैं और इजरायल की सुरक्षा नीति को किस दिशा में ले जाते हैं। रिपोर्टर * श्रीमती शोभा भाटी Post navigation राहुल गांधी की कोटा में छात्रों की महारैली: 17 जून को शिक्षा और रोजगार के मुद्दों पर होगा बड़ा शक्ति प्रदर्शन “ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देंगे” – नेतन्याहू का बड़ा ऐलान, किसी भी डील से पीछे नहीं हटेगा इजरायल