भारतीय सेना ने हाल के वर्षों में अपनी कार्यप्रणाली, परंपराओं और सैन्य संस्कृति में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। इसी क्रम में सेना द्वारा ब्रिटिश शासनकाल से चली आ रही कुछ पुरानी परंपराओं को समाप्त करने या उनमें बदलाव करने का निर्णय लिया गया है। इस कदम को भारत की स्वतंत्र सैन्य पहचान को मजबूत करने और सेना को आधुनिक तथा भारतीय मूल्यों के अनुरूप बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।

भारत को आज़ादी मिले लगभग आठ दशक हो चुके हैं, लेकिन सेना की कई परंपराएं, नियम और प्रतीक ब्रिटिश शासन की विरासत के रूप में लंबे समय तक बने रहे। हालांकि इन परंपराओं का ऐतिहासिक महत्व रहा है, लेकिन बदलते समय के साथ यह महसूस किया गया कि भारतीय सेना को अपनी विशिष्ट पहचान विकसित करनी चाहिए, जो देश की संस्कृति, इतिहास और राष्ट्रीय गौरव को बेहतर ढंग से दर्शाए।

क्यों लिया गया यह फैसला?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय सेना अब पूरी तरह आत्मनिर्भर और आधुनिक सैन्य शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसे में औपनिवेशिक युग की कुछ परंपराएं वर्तमान भारत की सोच और सैन्य दृष्टिकोण से मेल नहीं खातीं। सेना का उद्देश्य केवल सैन्य ताकत बढ़ाना ही नहीं है, बल्कि सैनिकों में भारतीयता और राष्ट्रीय गौरव की भावना को और मजबूत करना भी है।

सरकार और रक्षा मंत्रालय लंबे समय से विभिन्न संस्थानों में औपनिवेशिक प्रतीकों और परंपराओं की समीक्षा कर रहे हैं। इसी प्रक्रिया के तहत सेना में भी कई बदलाव किए जा रहे हैं।

किन परंपराओं में हो रहा है बदलाव?

हालांकि अलग-अलग सैन्य इकाइयों में बदलावों का स्वरूप अलग हो सकता है, लेकिन मुख्य रूप से उन परंपराओं की समीक्षा की जा रही है जो सीधे तौर पर ब्रिटिश सैन्य संस्कृति से जुड़ी थीं। इनमें कुछ औपचारिक समारोह, विशेष संबोधन शैली, प्रतीकात्मक व्यवस्थाएं और कुछ प्रशासनिक परंपराएं शामिल हैं।

सेना ने कई स्थानों पर भारतीय सैन्य नायकों, स्वतंत्रता सेनानियों और ऐतिहासिक योद्धाओं से जुड़े प्रतीकों को बढ़ावा देना शुरू किया है। इसके अलावा विभिन्न सैन्य प्रतिष्ठानों में भारतीय संस्कृति और विरासत को दर्शाने वाले तत्वों को भी शामिल किया जा रहा है।

भारतीय सैन्य विरासत को मिलेगा सम्मान

भारत का सैन्य इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक देश ने अनेक वीर योद्धाओं और सैन्य रणनीतिकारों को जन्म दिया है। छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह और कई अन्य महान योद्धाओं की विरासत भारतीय सेना के लिए प्रेरणा का स्रोत रही है।

नई पहल के माध्यम से सेना इन ऐतिहासिक परंपराओं और भारतीय सैन्य मूल्यों को अधिक प्रमुखता देना चाहती है। इससे जवानों और अधिकारियों में देश के गौरवशाली इतिहास के प्रति जागरूकता और सम्मान बढ़ेगा।

आधुनिक सेना की जरूरतों के अनुरूप बदलाव

आज की युद्ध परिस्थितियां पहले की तुलना में पूरी तरह बदल चुकी हैं। साइबर युद्ध, ड्रोन तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक हथियारों के दौर में सेना को केवल परंपराओं पर नहीं बल्कि नवाचार और तकनीकी दक्षता पर भी ध्यान देना पड़ता है।

ऐसे में सेना का मानना है कि संगठन की संस्कृति भी आधुनिक सोच के अनुरूप होनी चाहिए। ब्रिटिश युग की कुछ परंपराएं, जो वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिक नहीं रह गई हैं, उन्हें हटाकर अधिक प्रभावी और भारतीय दृष्टिकोण को अपनाया जा सकता है।

सैनिकों और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

रक्षा मामलों के जानकार इस निर्णय को सकारात्मक कदम मान रहे हैं। उनका कहना है कि किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र की सेना की अपनी अलग पहचान होनी चाहिए। भारतीय सेना विश्व की सबसे पेशेवर सेनाओं में से एक है और उसे अपनी ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप आगे बढ़ना चाहिए।

कई पूर्व सैन्य अधिकारियों ने भी माना है कि परंपराओं में बदलाव समय की मांग है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि सेना की मूल भावना, अनुशासन और पेशेवर उत्कृष्टता को बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है।

 

 

 

रिपोर्टर * श्रीमती शोभा भाटी

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