राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा ‘डांसिंग गर्ल’ को लेकर उठे विवाद के बाद NCERT ने अपने रुख में बदलाव किया है, जिसे कई लोग “यू-टर्न” के रूप में देख रहे हैं। इस फैसले के बाद शिक्षा जगत, इतिहासकारों और राजनीतिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है।

‘डांसिंग गर्ल’ प्रतिमा भारत की सबसे प्रसिद्ध पुरातात्विक खोजों में से एक मानी जाती है। यह प्रतिमा सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई थी और भारतीय इतिहास तथा संस्कृति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है। दशकों से यह प्रतिमा इतिहास और सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों में विद्यार्थियों को प्राचीन भारतीय सभ्यता की कला और संस्कृति से परिचित कराने के लिए शामिल की जाती रही है।

हाल ही में NCERT की पाठ्यपुस्तकों में किए गए कुछ बदलावों को लेकर विवाद शुरू हुआ। आरोप लगाए गए कि कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भों और चित्रों को हटाया या सीमित किया जा रहा है। इसी दौरान ‘डांसिंग गर्ल’ चित्र को लेकर भी चर्चा तेज हो गई। कई शिक्षाविदों और इतिहासकारों ने चिंता जताई कि इस तरह के प्रतीकों को कम महत्व देना छात्रों के इतिहास बोध को प्रभावित कर सकता है।

विवाद बढ़ने के बाद NCERT ने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। परिषद की ओर से कहा गया कि पाठ्यपुस्तकों में बदलाव का उद्देश्य पाठ्यक्रम को सरल और अधिक प्रासंगिक बनाना है, न कि किसी ऐतिहासिक तथ्य या सांस्कृतिक धरोहर को कम महत्व देना। हालांकि आलोचकों का कहना था कि ऐसे बदलावों से छात्रों तक पहुंचने वाली ऐतिहासिक जानकारी प्रभावित हो सकती है।

लगातार बढ़ते विवाद और सार्वजनिक चर्चा के बाद NCERT ने अपने निर्णय की समीक्षा की। इसके बाद परिषद ने संकेत दिए कि ‘डांसिंग गर्ल’ जैसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रतीकों को उचित स्थान दिया जाएगा। इस कदम को कई लोगों ने NCERT का “यू-टर्न” बताया, जबकि परिषद का कहना है कि यह केवल शैक्षणिक आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्विचार की प्रक्रिया है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इतिहास और संस्कृति से जुड़े विषयों में संतुलन बनाए रखना बेहद आवश्यक है। छात्रों को देश की प्राचीन सभ्यताओं, पुरातात्विक खोजों और सांस्कृतिक विरासत के बारे में सही और व्यापक जानकारी मिलनी चाहिए। ‘डांसिंग गर्ल’ जैसी प्रतिमाएं केवल कला का उदाहरण नहीं हैं, बल्कि वे हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता की सामाजिक और सांस्कृतिक समझ भी प्रदान करती हैं।

दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि पाठ्यक्रम में समय-समय पर बदलाव होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक जरूरतों के अनुसार ढालना आवश्यक है, लेकिन इसके साथ-साथ ऐतिहासिक तथ्यों और सांस्कृतिक धरोहरों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि स्कूलों में इतिहास और संस्कृति को किस रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। शिक्षा केवल तथ्यों का संग्रह नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है।

कुल मिलाकर, ‘डांसिंग गर्ल’ चित्र को लेकर हुए विवाद और उसके बाद NCERT के बदले रुख ने शिक्षा जगत में नई चर्चा को जन्म दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि परिषद पाठ्यपुस्तकों में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विषयों को किस प्रकार संतुलित रूप से प्रस्तुत करती है और छात्रों तक किस तरह की सामग्री पहुंचाती है।

रिपोर्टर * श्रीमती शोभा भाटी

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